दिनेश : सपनों की वर्दी
दिनेश गाँव के उस छोर पर बसे एक साधारण से घर में रहता था,
जहाँ सुबह की शुरुआत मुर्गे की बाँग और शाम का अंत मिट्टी के
चूल्हे की आँच से होता था। उसके पिता किसान थे और माँ गृहिणी। परिवार की आर्थिक
स्थिति सामान्य थी, पर संस्कारों की कमी नहीं थी। फिर भी एक
बात थी जो दिनेश को भीतर ही भीतर कचोटती रहती थी—पढ़ाई
में उसका मन बिल्कुल नहीं लगता था।
स्कूल की कक्षा उसके लिए किसी बोझ से कम नहीं थी। किताबें
खोलते ही आँखें भारी होने लगतीं, अध्यापक की आवाज़ कानों से टकराकर लौट
जाती। परीक्षा के दिनों में उसका मन डर और हीन भावना से भर जाता। जब सहपाठी अच्छे
अंक लाते, तो उसे अपने ऊपर क्रोध आता। लोग कहते—
“कुछ बनना है तो पढ़ना पड़ेगा।”
दिनेश चुप रहता, क्योंकि
वह जानता था कि पढ़ाई उसकी ताकत नहीं है।
लेकिन दिनेश बेकार भी नहीं था। उसके भीतर कुछ अलग करने की आग जलती रहती थी—कुछ
ऐसा, जिससे वह खुद पर गर्व कर सके, जिससे समाज उसे उसकी पहचान से जाने।
शाम होते ही दिनेश का ठिकाना गाँव का पुराना सामुदायिक हॉल बन
गया था, जहाँ कभी-कभी टीवी चल जाया करता था। एक
दिन वहाँ उसने एक फिल्म देखी—सैनिकों
पर आधारित। सीमा
पर तैनात जवान, बर्फ़ीली चोटियाँ, गोलियों की आवाज़, तिरंगे
की शान और “भारत माता की जय” के
नारे…
उस दिन दिनेश देर तक सो नहीं पाया।
उसके मन में बार-बार वही दृश्य घूमते रहे—
एक साधारण युवक, जो वर्दी पहनते ही देश का रक्षक बन जाता है।
उस दिन के बाद दिनेश की दुनिया बदलने लगी।
अब वह हर सैनिकों से जुड़ी फिल्म, डॉक्यूमेंट्री
और समाचार ध्यान से देखने लगा। उसे सैनिकों का अनुशासन, साहस
और त्याग आकर्षित करता था। वह समझने लगा कि सैनिक सिर्फ बंदूक नहीं उठाता, बल्कि अपने
डर, अपनी इच्छाओं और यहाँ तक कि अपने जीवन
का भी त्याग करने को तैयार रहता है।
धीरे-धीरे दिनेश ने एक फैसला कर लिया—
“अगर पढ़ाई मेरी ताकत नहीं है, तो मेहनत मेरी पहचान बनेगी।”
अगली सुबह से ही उसने अपनी दिनचर्या बदल दी। गाँव की कच्ची
सड़क पर सूरज निकलने से पहले दौड़ लगाना शुरू कर दिया। शुरू में पाँच सौ मीटर में
ही साँस फूल जाती, पैर काँपने लगते। लोग हँसते—
“ये क्या बनेगा? न पढ़ता है, न
आराम करता है।”
पर दिनेश नहीं रुका।
उसने खुद से वादा किया था।
वह खेतों में काम करता, शाम
को व्यायाम करता, पुश-अप्स, उठक-बैठक,
रस्सी कूदना—जो भी कर सकता था, पूरे मन से करता। उसने मोबाइल पर सैनिक भर्ती की शारीरिक
परीक्षाओं की जानकारी जुटाई। ऊँचाई, दौड़,
वजन—सबका ध्यान रखने लगा।
पढ़ाई से उसका मन आज भी नहीं लगता था, लेकिन
अब वह जरूरी जानकारी पढ़ता था—देश, सेना,
अनुशासन और नियम। यह पढ़ाई उसे बोझ नहीं लगती थी, क्योंकि इसका लक्ष्य साफ था। किसी तरह से उसने दसवीं की पढ़ाई
पूरी कर ली |
एक दिन गाँव में सेना भर्ती की सूचना आई। दिनेश की आँखों में
चमक आ गई। परिवार चिंतित था—
“अगर असफल हो गया तो?”
दिनेश ने पहली बार दृढ़ स्वर में कहा—
“कम से कम कोशिश तो करूँगा।”
भर्ती का दिन आया। सैकड़ों युवक कतार में खड़े थे—कोई शहर से आया था, कोई
कोचिंग लेकर। दिनेश के पास न महंगे जूते थे, न
विशेष प्रशिक्षण। था तो सिर्फ हौसला
और पसीने से सींची मेहनत।
दौड़ शुरू हुई।
पहला किलोमीटर आसान लगा, दूसरे
में साँस टूटने लगी, तीसरे में पैर जवाब देने लगे। मन ने कहा—रुक जा।
तभी उसे फिल्मों के वो दृश्य याद आए—सीमा
पर खड़ा जवान, गोली लगने के बाद भी तिरंगा न गिरने
देना।
दिनेश ने दाँत भींचे और दौड़ता रहा।
वह दौड़ पूरी कर गया।
बाकी परीक्षाएँ भी पार होती गईं। जब अंतिम सूची में उसका नाम
आया, तो दिनेश की आँखें भर आईं। वह चुपचाप
तिरंगे के सामने खड़ा रहा—उस साधारण लड़के का सपना सच हो चुका था।
कुछ महीनों बाद, जब
वह वर्दी पहनकर गाँव लौटा, तो वही लोग जो हँसते थे, सम्मान से खड़े हो गए। बच्चों की आँखों में चमक थी, बुजुर्गों की आँखों में गर्व।
दिनेश ने तब महसूस किया—
पढ़ाई में कमजोर होना असफलता नहीं है,
असफलता है अपने भीतर की क्षमता को न
पहचान पाना।
आज दिनेश समाज में सिर्फ एक सैनिक नहीं, बल्कि
उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो खुद को कमज़ोर समझ लेते हैं। उसकी
कहानी कहती है—
👉 हर किसी का रास्ता अलग होता है।
👉 जरूरी नहीं कि सफलता किताबों से ही आए।
👉 अगर लक्ष्य सच्चा हो और मेहनत ईमानदार,
तो साधारण इंसान भी असाधारण बन सकता है।
दिनेश ने साबित कर दिया कि सपने देखने की हिम्मत हो, तो वर्दी सिर्फ कपड़ा नहीं, पहचान बन जाती है।
अनिल कुमार गुप्ता
पुस्तकालय अध्यक्ष