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Thursday, January 1, 2026

भूतिया महल - एक प्रेरणादायक कहानी

 भूतिया महल

गाँव के उत्तर छोर पर, सालों से खड़ा एक जर्जर-सा महल था। टूटी हुई खिड़कियाँ, झूलते दरवाज़े, दीवारों पर उगी काई और हर समय वहाँ पसरा रहने वाला सन्नाटाइन सबके कारण लोग उसे भूतिया महल कहते थे। शाम ढलते ही उस ओर कोई झाँकने की हिम्मत नहीं करता था। बच्चों को डराने के लिए बड़े बस इतना कह देते—“पढ़-लिख लो, वरना भूतिया महल तुम्हें उठा ले जाएगा।

इसी गाँव में रहता था मोंटूकामचोरी का जीता-जागता उदाहरण। न पढ़ाई में मन लगता, न घर के किसी काम में। माँ जब कहती, “बेटा, ज़रा किताब खोल लो,” तो मोंटू जम्हाई लेकर कह देता, “अभी तो बहुत समय है।पिता खेत से थके-हारे लौटते और कहते, “कुछ तो सीख ले,” तो वह कंधे उचका देता। उसे बस दोस्तों के साथ घूमना, गिल्ली-डंडा खेलना और बेवजह हँसना आता था।

मोंटू के दोस्तगोलू, पिंटू और चीकूअक्सर उसे चिढ़ाते रहते।
अरे मोंटू, तू तो पैदा ही आराम करने के लिए हुआ है,” गोलू हँसता।
कल बड़ा आदमी बनेगानींद विशेषज्ञ!पिंटू ताना मारता।
मोंटू बाहर से हँस देता, पर भीतर कहीं कुछ चुभता था। उसे लगता था कि वह कुछ कर सकता है, पर आलस और डर उसे जकड़े रहते।

एक दिन स्कूल में अध्यापक ने घोषणा की—“अगले महीने वार्षिक परीक्षा है। जो मेहनत नहीं करेगा, वही पछताएगा।पूरी कक्षा में सन्नाटा छा गया, सिवाय मोंटू के। वह खिड़की से बाहर ताक रहा थाउसी भूतिया महल की ओर।

उसी शाम दोस्तों ने शर्त लगा दी।
हिम्मत है तो आज रात भूतिया महल के भीतर जाकर आ,” चीकू ने कहा।
कामचोर कहीं का! डरपोक!पिंटू ने जोड़ा।
मोंटू का अहंकार जाग उठा। उसने बिना सोचे कहा, “ठीक है, मैं जाऊँगा।

रात गहरी हो चुकी थी। चाँद बादलों में छिपा-छिपा सा खेल रहा था। मोंटू दिल पर पत्थर रखकर महल के फाटक तक पहुँचा। फाटक चरमरायाकिर्रकिर्रजैसे किसी ने चेतावनी दी हो। वह काँपा, पर कदम आगे बढ़ा दिए। भीतर घुसते ही ठंडी हवा का झोंका आया और दीपक की लौ थरथरा उठी।

अचानक उसे लगा जैसे किसी ने फुसफुसाकर कहा—“वापस लौट जाओ…”
मोंटू घबरा गया, पर तभी उसे दोस्तों की हँसी याद आई। उसने खुद को संभाला और आगे बढ़ा।

महल के भीतर एक बड़ा-सा हॉल था। बीचोंबीच धूल जमी मेज़ और दीवार पर टंगा एक पुराना चित्र। चित्र में एक युवक थाआँखों में अजीब-सी उदासी। तभी पीछे से भारी आवाज़ गूँजी
क्यों आए हो यहाँ?”

मोंटू का कलेजा मुँह को आ गया। वह घूमते हुए बोला, “कौन है?”
अंधेरे से एक धुँधली आकृति उभरी। वह भूत नहीं, बल्कि किसी बूढ़े व्यक्ति की छाया थी।
डरो मत,” आवाज़ नरम थी, “मैं इस महल का रखवाला हूँऔर कभी इस गाँव का सबसे आलसी लड़का था।

आलसी?” मोंटू चौंक पड़ा।
हाँ,” छाया बोली, “मेरा नाम था माधव। मैं भी तुम्हारी तरह काम से भागता था। पढ़ाई को बोझ समझता था। लोग मुझे निकम्मा कहते थे।

मोंटू को लगा जैसे कोई उसकी कहानी सुना रहा हो।
फिर?” उसने धीरे से पूछा।

फिर एक दिन मुझे भी चुनौती मिली। इसी महल में आया। यहाँ मुझे एक रहस्य पता चलामेरी असली दुश्मन कोई भूत नहीं, बल्कि मेरा आलस था।
छाया ने दीवार की ओर इशारा किया। वहाँ एक बंद दरवाज़ा था।
उस दरवाज़े के पीछे मेरी डायरी है। पढ़ो।

मोंटू काँपते कदमों से दरवाज़ा खोलता है। भीतर एक पुरानी डायरी पड़ी थी। उसने पहला पन्ना खोला

आज फिर मैंने काम टाल दिया। दिल कहता हैकल कर लूँगा। पर हर कल, आज बनकर मुझे चिढ़ा जाता है।

पन्ने पलटते गए। हर पन्ने पर पछतावे की स्याही थीअधूरी पढ़ाई, छूटे अवसर, टूटे सपने। आख़िरी पन्ने पर लिखा था

जो समय को नहीं पकड़ता, समय उसे छोड़ देता है।

मोंटू की आँखें नम हो गईं।
मैं यही गलती कर रहा हूँ…” वह बुदबुदाया।

तभी छाया बोली—“मोंटू, यह महल भूतिया नहीं, सच का आईना है। यहाँ आने वाले वही देखते हैं, जिससे वे भागते रहते हैं। तुम चाहो तो अभी भी लौट सकते होवैसे ही जैसे आए हो। या फिर इस रहस्य को अपनी ताक़त बना सकते हो।

मैंमैं बदलना चाहता हूँ,” मोंटू ने दृढ़ता से कहा।

छाया मुस्कराई। तो सुनोडर से नहीं, अनुशासन से आगे बढ़ो। रोज़ थोड़ा-सा काम, पूरे मन से। आलस को टालो, काम को नहीं।

इतना कहकर छाया धीरे-धीरे हवा में घुल गई। हॉल में सन्नाटा छा गया, पर मोंटू के भीतर एक आवाज़ जाग चुकी थी।

वह महल से बाहर निकला। रात वही थी, पर मोंटू वही नहीं था।

अगली सुबह मोंटू जल्दी उठ गया। माँ ने हैरानी से देखा—“आज सूरज पश्चिम से उगा है क्या?”
मोंटू मुस्कराया, “नहीं माँ, आज मैं खुद से भागना छोड़ रहा हूँ।

उसने पढ़ाई का छोटा-सा समय-सारिणी बनाई। पहले दिन मुश्किल हुई, पर उसने डायरी का आख़िरी वाक्य याद किया। धीरे-धीरे दिन बदले। दोस्त चिढ़ाने आए तो उसने शांत स्वर में कहा—“हँस लो, पर मैं रुकूँगा नहीं।

परीक्षा आई। मोंटू ने पूरी तैयारी नहीं की थी, पर जितनी की थी, ईमानदारी से की थी। परिणाम आयावह अव्वल तो नहीं आया, पर फेल भी नहीं हुआ। उसके चेहरे पर संतोष थाएक नई शुरुआत का।

कुछ महीनों बाद वही दोस्त बोले
यार मोंटू, तू बदल गया है।
मोंटू मुस्कराया—“नहीं, मैं खुद को पहचान गया हूँ।

भूतिया महल आज भी गाँव के किनारे खड़ा है। लोग अब भी डरते हैं। पर मोंटू जानता हैवहाँ कोई भूत नहीं, बल्कि एक सच्चाई रहती है, जो सही समय पर किसी न किसी को बुला लेती हैऔर उसकी ज़िन्दगी को नई दिशा दे देती है।


अनिल कुमार गुप्ता 

पुस्तकालय अध्यक्ष 

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