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MR . Anil Kumar Gupta ( Librarian ) ( Regional incentive Award- 2014 ), Best Scout Master Award.

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Education - M COM, M A ( Economics and English Literature) , M Lib & I Sc, DCA. I have published 6 books and 3 articles in the form of papers. I am known as thinker, shayar, storywriter, poet and a writer. I have published more than 30 articles online and more than 1600 hundred poems in Hindi and some of them in English. I have written motivational thoughts in Hindi and English. You can search me on any search engine as "Anil Kumar Gupta, Librarian KVS" and as "Anil Kumar Gupta Anjum"

Thursday, January 1, 2026

नेहा : संघर्ष से सेवा तक - कहानी

 नेहा : संघर्ष से सेवा तक - कहानी 

नेहा का जन्म एक छोटे से कस्बे के झोपड़ीनुमा घर में हुआ था। घर मिट्टी का था, छत टीन की, और आँगन में हर समय गरीबी की परछाईं पसरी रहती थी। उसके पिता दिहाड़ी मजदूर थे, जिनकी कमाई दिन पर निर्भर करती थी, और माँ लोगों के घरों में काम करके परिवार का पेट पालती थीं। घर में पैसों की तंगी तो थी ही, सपनों की भी किल्लत थी। पर नेहा के दिल में बचपन से ही एक सपना पल रहा थाबड़ी होकर समाज सेवा करना।

नेहा को किताबों से बेहद लगाव था। स्कूल जाते समय रास्ते में पड़ी पुरानी किताबें उठाकर वह उन्हें सहेज लेती। जब वह किसी बीमार पड़ोसी की मदद करती या किसी छोटे बच्चे को पढ़ाती, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही संतोष झलकता। उसे लगता था कि अगर पढ़-लिखकर कुछ बन गई, तो वह उन लोगों के लिए कुछ कर सकेगी जो उसकी तरह मजबूर हैं।

लेकिन सपनों और हकीकत के बीच गहरी खाई थी।

जैसे-जैसे नेहा बड़ी होती गई, पढ़ाई का खर्च बढ़ता गया। आठवीं के बाद पिता ने साफ कह दिया,
बेटी, हम तुम्हें ज्यादा नहीं पढ़ा सकते। घर की हालत तुम जानती हो।
नेहा चुप रही। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ में शिकायत नहीं। वह समझती थी कि पिता की मजबूरी उनकी कमजोरी नहीं है।

उसी समय उसकी ज़िंदगी में एक नया मोड़ आया।

उसके दूर के चाचारामप्रसादएक छोटे शहर में रहते थे। वे स्वयं एक साधारण नौकरी करते थे, लेकिन शिक्षा के महत्व को गहराई से समझते थे। एक दिन गाँव आए तो उन्होंने नेहा की कॉपी-किताबें देखीं और उसकी बातें सुनीं। उसकी आँखों में चमक और शब्दों में स्पष्टता देखकर उन्होंने निर्णय कर लिया।

उन्होंने पिता से कहा,
अगर आप अनुमति दें, तो नेहा को मैं अपने साथ ले जाऊँ। पढ़ाई का पूरा प्रयास करूँगा।

माँ की आँखें भर आईं। पिता ने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद हामी भर दी। उस दिन नेहा ने पहली बार महसूस किया कि ईश्वर किसी न किसी रूप में रास्ता दिखा ही देता है।

चाचा के घर पहुँचना नेहा के लिए आसान नहीं था। नया शहर, नई भाषा, नया माहौलसब कुछ अनजाना था। चाचा का घर भी बहुत बड़ा नहीं था, साधन सीमित थे। नेहा सुबह घर के काम में हाथ बँटाती और फिर स्कूल चली जाती। कई बार मन थक जाता, पर वह जानती थी कि यह संघर्ष उसकी उड़ान की कीमत है।

स्कूल में नेहा मेहनती और अनुशासित छात्रा के रूप में जानी जाने लगी। वह देर रात तक पढ़ती, पुरानी किताबों से काम चलाती, और कभी शिकायत नहीं करती। चाचा ने उसे हमेशा यही सिखाया
बेटी, शिक्षा सिर्फ नौकरी के लिए नहीं, सेवा के लिए भी होती है।

बारहवीं पास करने के बाद नेहा ने कॉलेज में प्रवेश लिया। कॉलेज की फीस, किताबें और अन्य खर्च अब नई चुनौती थे। चाचा अकेले सब संभाल रहे थे, और नेहा यह बोझ बनना नहीं चाहती थी।

तभी उसने एक निर्णय लियाट्यूशन पढ़ाने का।

शुरुआत में दो छोटे बच्चों को पढ़ाया। फीस बहुत कम थी, लेकिन आत्मसम्मान बहुत बड़ा। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी। बच्चों के परिणाम अच्छे आने लगे, और छात्रों की संख्या बढ़ती गई। अब वह अपनी कुछ जरूरतें खुद पूरी कर लेती थीकॉपी, किताबें, यहाँ तक कि कॉलेज की कुछ फीस भी।

कॉलेज का जीवन आसान नहीं था। सुबह कॉलेज, दोपहर में ट्यूशन, शाम को घर के काम, और रात को अपनी पढ़ाई। कई बार शरीर थक जाता, लेकिन मन अडिग रहता। जब कभी हिम्मत टूटने लगती, तो उसे अपने बचपन की झोपड़ी और माँ के खुरदरे हाथ याद आ जाते।

नेहा का सपना अब और स्पष्ट हो गया था। वह सिर्फ अपने लिए नहीं पढ़ रही थी, बल्कि उन सबके लिए पढ़ रही थी जिनकी आवाज़ कभी सुनी नहीं जाती। कॉलेज में उसने सामाजिक कार्यों से जुड़े कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू कियास्वच्छता अभियान, शिक्षा जागरूकता, महिला सशक्तिकरण। उसे वहाँ जाकर महसूस हुआ कि सेवा किताबों से बाहर निकलकर लोगों के बीच जाकर होती है।

डिग्री पूरी होते-होते नेहा एक आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी युवती बन चुकी थी। उसने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि यह भी साबित किया कि हालात कितने भी कठिन हों, अगर नीयत साफ हो तो रास्ते निकल आते हैं।

जब वह पहली बार अपने गाँव लौटी, तो वही लोग जो कभी उसकी पढ़ाई को बोझ समझते थे, आज गर्व से उसका नाम लेते थे। माँ की आँखों में आँसू थेइस बार दुख के नहीं, गर्व के।

नेहा जानती थी कि यह मंज़िल नहीं, बस एक शुरुआत है। उसके मन में आज भी वही सपना थासमाज सेवा। फर्क बस इतना था कि अब उसके पास शिक्षा, अनुभव और आत्मबल था।

नेहा की कहानी हमें सिखाती है कि

·         गरीबी सपनों की कब्र नहीं होती।

·         मदद करने वाले रास्ते में देवदूत बनकर आते हैं।

·         और जो खुद संघर्ष से गुजरता है, वही समाज का दर्द समझ सकता है।

नेहा आज भी उसी विश्वास के साथ आगे बढ़ रही है
कि सेवा सबसे बड़ी सफलता है, और संघर्ष उसकी सबसे सच्ची शिक्षा।


अनिल कुमार गुप्ता 

पुस्तकालय अध्यक्ष 

 

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